बीज से वृक्ष तक — अखाड़ा परंपरा का सफर
आदि शंकराचार्य जी से डिजिटल युग तक, हर सदी में अखाड़ों ने धर्म रक्षा की मशाल को आगे बढ़ाया।
आदि शंकराचार्य जी
काम: 32 साल की उम्र में भारत भ्रमण। 4 धाम + 4 मठ स्थापित।
देन: दशनामी परम्परा — 10 नाम। सन्यासियों को "ज्ञान + शस्त्र" दोनों का आदेश।
रामानुजाचार्य जी
काम: श्री सम्प्रदाय की स्थापना। वैष्णव भक्ति को संगठित किया।
देन: वैरागी अखाड़ों की नींव — निर्वाणी, दिगंबर, निर्मोही। "चंदन-तिलक वाले योद्धा"।
गुरु नानक देव जी
काम: उदासीन परम्परा की शुरुआत।
देन: 3 उदासीन अखाड़े बने। "सेवा + त्याग + शस्त्र"।
मधुसूदन सरस्वती जी
काम: अकबर के दरबार में शास्त्रार्थ।
देन: जूना अखाड़े को फौज का रूप दिया। नागा सन्यासियों को युद्ध कला सिखाई — इसीलिए जूना को "मधुसूदनी सम्प्रदाय" कहते हैं।
औरंगजेब से अंग्रेज तक
घटना: मंदिर तोड़े गए, गौ कटी, संत मारे गए।
रोल: नागा सेना मैदान में। हरिद्वार 1760 का कुंभ युद्ध — जूना vs वैरागी, शाही स्नान के क्रम के लिए। दोनों पक्ष के 1800+ नागा शहीद।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद
काम: 13 अखाड़ों को एक मंच पर लाया गया।
उद्देश्य: कुंभ का प्रबंधन, धर्म संसद, आपसी विवाद सुलझाना। पहला अध्यक्ष जूना अखाड़े के महंत बने।
राम जन्मभूमि आंदोलन
रोल: निर्मोही अखाड़ा सबसे आगे रहा।
स्तम्भ: महंत नृत्य गोपाल दास जी, महंत रामचंद्र दास परमहंस जी — अखाड़े के संत ही आंदोलन के स्तम्भ रहे।
आज तक — कलम भी, तलवार भी
गौ रक्षा: सभी 13 अखाड़े गौ हत्या विरोध में एकजुट। "गौ आयोग" की मांग।
युवा दीक्षा: योग, संस्कृत, शस्त्र, साइबर धर्म रक्षा — नई दीक्षा की राह।
1949 का संकल्प पत्र
माघ पूर्णिमा, प्रयागराज अर्धकुंभ — त्रिवेणी संगम तट, साक्षी गंगा-यमुना-सरस्वती
पृष्ठभूमि: 1947 में देश आजाद हुआ, पर सनातन के रक्षक 13 अखाड़े बिखरे पड़े थे — शाही स्नान का क्रम, धर्म निर्णय, कुंभ प्रबंधन, हर बात पर विवाद।
धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज की हुंकार — "13 अखाड़े = 13 अंग। एक शरीर बनो, वरना धर्म कट जाएगा।"
एकता का संकल्प — जूना, निर्वाणी, निर्मोही, अटल, अग्नि सहित सभी 13 अखाड़े एक परिवार। आपसी विवाद का निर्णय अब परिषद करेगी, तलवार नहीं उठेगी।
शाही स्नान के क्रम का संकल्प — कुंभ में स्नान का क्रम परम्परा और ज्येष्ठता के अनुसार परिषद तय करेगी। विवाद की स्थिति में परिषद का निर्णय अंतिम होगा।
धर्म रक्षा का संकल्प — जब-जब गौ पर, मंदिर पर, साधु पर आंच आएगी, 13 अखाड़े एक साथ खड़े होंगे। "धर्मो रक्षति रक्षितः" ही एकमात्र मंत्र होगा।
कुंभ प्रबंधन का संकल्प — कुंभ मेले का प्रबंधन, अखाड़ों की व्यवस्था, संतों की सुरक्षा — सब परिषद के अधीन। शासन से वार्ता परिषद ही करेगी।
सनातन प्रचार का संकल्प — केवल झगड़ा सुलझाना ही नहीं — वेद, शास्त्र, योग, शस्त्र को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी परिषद का धर्म है।
धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज
श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी जूना के महंत
पहली बार: 1000 साल बाद सभी अखाड़े एक छत के नीचे।
अंग्रेजों के बाद: पराधीनता टूटी तो सबसे पहला काम — सनातन को संगठित करना।
आज तक: वही 1949 का संविधान चल रहा है, बस समय के साथ नियम जुड़ते गए।
उद्देश्य वाक्य — "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" — सत्य एक है, ज्ञानी उसे अलग-अलग कहते हैं।
अखाड़ा परिषद का विभाजन
हरिद्वार कुंभ 2021 से पहले, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद 2 भागों में बंट गई।
निरंजनी अखाड़ा गुट
अध्यक्षमहंत रविंद्र पुरी जी महाराज — श्री पंच दशनाम आवाहन अखाड़ा
समर्थनजूना, अग्नि, आनंद, आह्वान, अटल अखाड़े
कार्यालयहरिद्वार
आनंद अखाड़ा गुट
अध्यक्षमहंत हरेगिरी जी महाराज — श्री पंच दशनाम आनंद अखाड़ा
समर्थननिर्वाणी, निर्मोही, वैष्णव, उदासीन अखाड़े
कार्यालयप्रयागराज
विभाजन की 3 मुख्य वजहें
अध्यक्ष पद का विवाद
2018 में नरेंद्र गिरी जी महाराज अध्यक्ष बने। 2021 में देहांत के बाद अध्यक्ष कौन बने — इसी पर मतभेद हुआ।
13वें / 14वें अखाड़े का मामला
"किन्नर अखाड़ा" को 14वां अखाड़ा मानने पर विवाद। कुछ अखाड़े मानते हैं, कुछ नहीं।
कुंभ प्रबंधन नीति
शाही स्नान का क्रम, अखाड़ों की जमीन, मेला प्राधिकरण से वार्ता — नीति पर असहमति।
सनातन धर्म पर असर क्या हुआ?
दोनों परिषदें अपना-अपना कुंभ प्रबंधन करती हैं। शाही स्नान का क्रम अलग-अलग तय होता है।
पर सार बात — 13 अखाड़े जस के तस हैं। सिर्फ "मंच" दो हो गए। धर्म, परम्परा, शस्त्र-शास्त्र वही हैं।
जैसे कहा गया है — "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति"। मार्ग अलग हो सकते हैं, मंजिल एक है — धर्म रक्षा।
1200 साल का सफर — तीन वाक्यों में
शंकराचार्य जी ने बीज बोया → मधुसूदन सरस्वती जी ने फौज बनाई → आज का अखाड़ा कलम और शस्त्र दोनों से सनातन की रक्षा करता है।
योगी अखाड़ा फॉर्मूला — संरचना का विज्ञान
उपनिषद कहते हैं शरीर 5 कोश का है। योगी अखाड़े ने समाज को भी 5 कोश में बांधा — सूत्र: शरीर के 5 कोश = समाज की 5 सीढ़ी
पदाधिकारी: सदस्य पदाधिकारी
धर्म: अन्नदान, जल, वस्त्र, संकट में सहायता। जड़ तक पहुंच।
पदाधिकारी: सदस्य पदाधिकारी बंधु
धर्म: स्वास्थ्य, रक्तदान, शिविर, आपदा में प्राणरक्षा। सांस देना।
पदाधिकारी: प्रदेश अध्यक्ष/महामंत्री
धर्म: संस्कार, शिक्षा, विवाद निपटारा, मन को धर्म से जोड़ना।
पदाधिकारी: राष्ट्रीय पदाधिकारी सदस्य
धर्म: नीति, संस्कृति, गुरुकुल, मीडिया, धर्म की वैज्ञानिक व्याख्या।
परिणाम: सेवा से मिलने वाला फल
धर्म: सुखी परिवार, सशक्त समाज, सनातन की प्रतिष्ठा। यही मोक्ष है।
फॉर्मूले का सार — 4 लाइन में
ऊपर से नीचे ऊर्जा, नीचे से ऊपर परिणाम — राष्ट्रीय पदाधिकारी नीति बनाएगा = विज्ञानमय। प्रदेश मन में उतारेगा = मनोमय। जिला प्राण फूंकेगा = प्राणमय। ब्लॉक अन्न बनकर घर पहुंचेगा = अन्नमय। अंत में समाज को आनंद मिलेगा = आनंदमय।
"सेवा ही साधना" का गणित — 13 अखाड़े = साधना से सिद्धि। योगी अखाड़ा = सेवा से सिद्धि। अन्नमय से शुरू, आनंदमय पर खत्म — यही पूर्ण योग है।
कलयुग का मॉडल — मंदिर में घंटा बजाने से घंटा बजेगा। ब्लॉक के सदस्य के दरवाजे पर पहुंचने से धर्म जगेगा। इसलिए अन्नमय को पहली सीढ़ी रखा गया।
अंतिम सत्य — "पद नहीं, कोश है ये"। कोश मतलब खोल। हर पदाधिकारी समाज के एक खोल को तोड़कर धर्म से जोड़ेगा। 5 खोल टूटे = आनंदमय प्रकट।
पदाधिकारियों की शपथ
पंचकोशीय शपथ पत्र
मैं, ____, योगी अखाड़े का सेवक, संकल्प लेता हूं —
अन्नमय कोश — अंतिम व्यक्ति तक अन्न-जल पहुंचाऊंगा। कोई भूखा न सोए।
प्राणमय कोश — प्राण संकट में प्राण दूंगा। रक्त, दवा, सेवा में पीछे न हटूंगा।
मनोमय कोश — मन को धर्म से जोड़ूंगा। झगड़ा मिटाकर संस्कार जगाऊंगा।
विज्ञानमय कोश — सनातन को तर्क से समझूंगा और समझाऊंगा। भ्रम तोड़ूंगा।
आनंदमय कोश — पद नहीं मांगूंगा, परिणाम मांगूंगा। समाज के आनंद में अपना आनंद देखूंगा।
शपथ वाक्य — "मैं सेवक हूं, सेवा ही मेरा पद, आनंद ही मेरा पुरस्कार।"
पदाधिकारी की 5 योग्यता
सूत्र: पद नहीं मिलेगा, कोश सिद्ध करना पड़ेगा
सेवाभाव
परीक्षा: 1 महीने तक बिना पद के ब्लॉक में सेवा। भूखे को रोटी खिलाओ।
वर्जित: "मैं अध्यक्ष हूं" ये अहंकार मना है।
त्यागभाव
परीक्षा: रात 12 बजे भी फोन करे तो प्राण बचाने दौड़ो। रक्तदान करो।
वर्जित: आलस, "कल कर देंगे" मना है।
समभाव
परीक्षा: दो दुश्मनों को गले लगवाओ। जाति-भेद मिटाओ।
वर्जित: पक्षपात, "मेरा वाला" मना है।
ज्ञानभाव
परीक्षा: गीता का 1 श्लोक और उसका विज्ञान जनता को समझाओ। भ्रम तोड़ो।
वर्जित: अंधविश्वास फैलाना मना है।
निष्काम भाव
परीक्षा: सेवा करके फोटो न खिंचवाओ। परिणाम भगवान पर छोड़ो।
वर्जित: पद का लालच, फोटो-प्रचार मना है।
"पद ऊपर से नहीं उतरेगा, कोश नीचे से सिद्ध होगा। जो अन्नमय से शुरू करेगा, वही आनंदमय तक पहुंचेगा।"