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कुंभ स्नान - संगम तट ॐ शाश्वत
अखाड़ा परम्परा - शस्त्र पूजा त्रिशूल

1200 साल की गाथा

अखाड़ा परंपरा

नई ऊर्जा के साथ — शंकराचार्य जी से आज तक

"धर्मो रक्षति रक्षितः"

5 युग

बीज से वृक्ष तक — अखाड़ा परंपरा का सफर

आदि शंकराचार्य जी से डिजिटल युग तक, हर सदी में अखाड़ों ने धर्म रक्षा की मशाल को आगे बढ़ाया।

1
788–820 ईस्वी • बीज वपन

आदि शंकराचार्य जी

काम: 32 साल की उम्र में भारत भ्रमण। 4 धाम + 4 मठ स्थापित।

देन: दशनामी परम्परा — 10 नाम। सन्यासियों को "ज्ञान + शस्त्र" दोनों का आदेश।

2
1017–1137 ईस्वी • संगठन

रामानुजाचार्य जी

काम: श्री सम्प्रदाय की स्थापना। वैष्णव भक्ति को संगठित किया।

देन: वैरागी अखाड़ों की नींव — निर्वाणी, दिगंबर, निर्मोही। "चंदन-तिलक वाले योद्धा"।

3
1469–1539 ईस्वी • संगठन

गुरु नानक देव जी

काम: उदासीन परम्परा की शुरुआत।

देन: 3 उदासीन अखाड़े बने। "सेवा + त्याग + शस्त्र"।

4
1489–1564 ईस्वी • शस्त्रीकरण

मधुसूदन सरस्वती जी

काम: अकबर के दरबार में शास्त्रार्थ।

देन: जूना अखाड़े को फौज का रूप दिया। नागा सन्यासियों को युद्ध कला सिखाई — इसीलिए जूना को "मधुसूदनी सम्प्रदाय" कहते हैं।

5
1675–1760 ईस्वी • शस्त्रीकरण

औरंगजेब से अंग्रेज तक

घटना: मंदिर तोड़े गए, गौ कटी, संत मारे गए।

रोल: नागा सेना मैदान में। हरिद्वार 1760 का कुंभ युद्ध — जूना vs वैरागी, शाही स्नान के क्रम के लिए। दोनों पक्ष के 1800+ नागा शहीद।

6
1954 ईस्वी • आधुनिक रूप

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद

काम: 13 अखाड़ों को एक मंच पर लाया गया।

उद्देश्य: कुंभ का प्रबंधन, धर्म संसद, आपसी विवाद सुलझाना। पहला अध्यक्ष जूना अखाड़े के महंत बने।

7
1949–1992 ईस्वी • आधुनिक रूप

राम जन्मभूमि आंदोलन

रोल: निर्मोही अखाड़ा सबसे आगे रहा।

स्तम्भ: महंत नृत्य गोपाल दास जी, महंत रामचंद्र दास परमहंस जी — अखाड़े के संत ही आंदोलन के स्तम्भ रहे।

8
2013–2025 ईस्वी • डिजिटल युग

आज तक — कलम भी, तलवार भी

गौ रक्षा: सभी 13 अखाड़े गौ हत्या विरोध में एकजुट। "गौ आयोग" की मांग।

युवा दीक्षा: योग, संस्कृत, शस्त्र, साइबर धर्म रक्षा — नई दीक्षा की राह।

ऐतिहासिक चार्टर

1949 का संकल्प पत्र

माघ पूर्णिमा, प्रयागराज अर्धकुंभ — त्रिवेणी संगम तट, साक्षी गंगा-यमुना-सरस्वती

संकल्प1949

पृष्ठभूमि: 1947 में देश आजाद हुआ, पर सनातन के रक्षक 13 अखाड़े बिखरे पड़े थे — शाही स्नान का क्रम, धर्म निर्णय, कुंभ प्रबंधन, हर बात पर विवाद।

धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज की हुंकार — "13 अखाड़े = 13 अंग। एक शरीर बनो, वरना धर्म कट जाएगा।"
1

एकता का संकल्प — जूना, निर्वाणी, निर्मोही, अटल, अग्नि सहित सभी 13 अखाड़े एक परिवार। आपसी विवाद का निर्णय अब परिषद करेगी, तलवार नहीं उठेगी।

2

शाही स्नान के क्रम का संकल्प — कुंभ में स्नान का क्रम परम्परा और ज्येष्ठता के अनुसार परिषद तय करेगी। विवाद की स्थिति में परिषद का निर्णय अंतिम होगा।

3

धर्म रक्षा का संकल्प — जब-जब गौ पर, मंदिर पर, साधु पर आंच आएगी, 13 अखाड़े एक साथ खड़े होंगे। "धर्मो रक्षति रक्षितः" ही एकमात्र मंत्र होगा।

4

कुंभ प्रबंधन का संकल्प — कुंभ मेले का प्रबंधन, अखाड़ों की व्यवस्था, संतों की सुरक्षा — सब परिषद के अधीन। शासन से वार्ता परिषद ही करेगी।

5

सनातन प्रचार का संकल्प — केवल झगड़ा सुलझाना ही नहीं — वेद, शास्त्र, योग, शस्त्र को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी परिषद का धर्म है।

संरक्षक / प्रेरक

धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज

पहले अध्यक्ष

श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी जूना के महंत

पहली बार: 1000 साल बाद सभी अखाड़े एक छत के नीचे।

अंग्रेजों के बाद: पराधीनता टूटी तो सबसे पहला काम — सनातन को संगठित करना।

आज तक: वही 1949 का संविधान चल रहा है, बस समय के साथ नियम जुड़ते गए।

उद्देश्य वाक्य — "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" — सत्य एक है, ज्ञानी उसे अलग-अलग कहते हैं।

2019 से

अखाड़ा परिषद का विभाजन

हरिद्वार कुंभ 2021 से पहले, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद 2 भागों में बंट गई।

क्या हुआ 2019 में? — एक ही मंच की जगह अब दो परिषदें काम करने लगीं।
भाग 1

निरंजनी अखाड़ा गुट

अध्यक्षमहंत रविंद्र पुरी जी महाराज — श्री पंच दशनाम आवाहन अखाड़ा

समर्थनजूना, अग्नि, आनंद, आह्वान, अटल अखाड़े

कार्यालयहरिद्वार

भाग 2

आनंद अखाड़ा गुट

अध्यक्षमहंत हरेगिरी जी महाराज — श्री पंच दशनाम आनंद अखाड़ा

समर्थननिर्वाणी, निर्मोही, वैष्णव, उदासीन अखाड़े

कार्यालयप्रयागराज

विभाजन की 3 मुख्य वजहें

1

अध्यक्ष पद का विवाद

2018 में नरेंद्र गिरी जी महाराज अध्यक्ष बने। 2021 में देहांत के बाद अध्यक्ष कौन बने — इसी पर मतभेद हुआ।

2

13वें / 14वें अखाड़े का मामला

"किन्नर अखाड़ा" को 14वां अखाड़ा मानने पर विवाद। कुछ अखाड़े मानते हैं, कुछ नहीं।

3

कुंभ प्रबंधन नीति

शाही स्नान का क्रम, अखाड़ों की जमीन, मेला प्राधिकरण से वार्ता — नीति पर असहमति।

सनातन धर्म पर असर क्या हुआ?

दोनों परिषदें अपना-अपना कुंभ प्रबंधन करती हैं। शाही स्नान का क्रम अलग-अलग तय होता है।

पर सार बात — 13 अखाड़े जस के तस हैं। सिर्फ "मंच" दो हो गए। धर्म, परम्परा, शस्त्र-शास्त्र वही हैं।

जैसे कहा गया है — "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति"। मार्ग अलग हो सकते हैं, मंजिल एक है — धर्म रक्षा।

सार

1200 साल का सफर — तीन वाक्यों में

शंकराचार्य जी ने बीज बोया → मधुसूदन सरस्वती जी ने फौज बनाई → आज का अखाड़ा कलम और शस्त्र दोनों से सनातन की रक्षा करता है।

भविष्य का संकल्प — "2047 तक हर जिले में अखाड़े की शाखा"
पंचकोशीय मॉडल

योगी अखाड़ा फॉर्मूला — संरचना का विज्ञान

उपनिषद कहते हैं शरीर 5 कोश का है। योगी अखाड़े ने समाज को भी 5 कोश में बांधा — सूत्र: शरीर के 5 कोश = समाज की 5 सीढ़ी

1
अन्नमय कोश ब्लॉक स्तर

पदाधिकारी: सदस्य पदाधिकारी

धर्म: अन्नदान, जल, वस्त्र, संकट में सहायता। जड़ तक पहुंच।

2
प्राणमय कोश जिला स्तरीय

पदाधिकारी: सदस्य पदाधिकारी बंधु

धर्म: स्वास्थ्य, रक्तदान, शिविर, आपदा में प्राणरक्षा। सांस देना।

3
मनोमय कोश प्रदेश स्तरीय

पदाधिकारी: प्रदेश अध्यक्ष/महामंत्री

धर्म: संस्कार, शिक्षा, विवाद निपटारा, मन को धर्म से जोड़ना।

4
विज्ञानमय कोश राष्ट्रीय स्तर

पदाधिकारी: राष्ट्रीय पदाधिकारी सदस्य

धर्म: नीति, संस्कृति, गुरुकुल, मीडिया, धर्म की वैज्ञानिक व्याख्या।

5
आनंदमय कोश परिणाम स्तर

परिणाम: सेवा से मिलने वाला फल

धर्म: सुखी परिवार, सशक्त समाज, सनातन की प्रतिष्ठा। यही मोक्ष है।

फॉर्मूले का सार — 4 लाइन में

1

ऊपर से नीचे ऊर्जा, नीचे से ऊपर परिणाम — राष्ट्रीय पदाधिकारी नीति बनाएगा = विज्ञानमय। प्रदेश मन में उतारेगा = मनोमय। जिला प्राण फूंकेगा = प्राणमय। ब्लॉक अन्न बनकर घर पहुंचेगा = अन्नमय। अंत में समाज को आनंद मिलेगा = आनंदमय।

2

"सेवा ही साधना" का गणित — 13 अखाड़े = साधना से सिद्धि। योगी अखाड़ा = सेवा से सिद्धि। अन्नमय से शुरू, आनंदमय पर खत्म — यही पूर्ण योग है।

3

कलयुग का मॉडल — मंदिर में घंटा बजाने से घंटा बजेगा। ब्लॉक के सदस्य के दरवाजे पर पहुंचने से धर्म जगेगा। इसलिए अन्नमय को पहली सीढ़ी रखा गया।

4

अंतिम सत्य — "पद नहीं, कोश है ये"। कोश मतलब खोल। हर पदाधिकारी समाज के एक खोल को तोड़कर धर्म से जोड़ेगा। 5 खोल टूटे = आनंदमय प्रकट।

शपथपंचकोश

पदाधिकारियों की शपथ

पंचकोशीय शपथ पत्र

मैं, ____, योगी अखाड़े का सेवक, संकल्प लेता हूं —
1

अन्नमय कोश — अंतिम व्यक्ति तक अन्न-जल पहुंचाऊंगा। कोई भूखा न सोए।

2

प्राणमय कोश — प्राण संकट में प्राण दूंगा। रक्त, दवा, सेवा में पीछे न हटूंगा।

3

मनोमय कोश — मन को धर्म से जोड़ूंगा। झगड़ा मिटाकर संस्कार जगाऊंगा।

4

विज्ञानमय कोश — सनातन को तर्क से समझूंगा और समझाऊंगा। भ्रम तोड़ूंगा।

5

आनंदमय कोश — पद नहीं मांगूंगा, परिणाम मांगूंगा। समाज के आनंद में अपना आनंद देखूंगा।

शपथ वाक्य — "मैं सेवक हूं, सेवा ही मेरा पद, आनंद ही मेरा पुरस्कार।"

पंचकोशीय आचार संहिता

पदाधिकारी की 5 योग्यता

सूत्र: पद नहीं मिलेगा, कोश सिद्ध करना पड़ेगा

1. अन्नमय

सेवाभाव

परीक्षा: 1 महीने तक बिना पद के ब्लॉक में सेवा। भूखे को रोटी खिलाओ।

वर्जित: "मैं अध्यक्ष हूं" ये अहंकार मना है।

2. प्राणमय

त्यागभाव

परीक्षा: रात 12 बजे भी फोन करे तो प्राण बचाने दौड़ो। रक्तदान करो।

वर्जित: आलस, "कल कर देंगे" मना है।

3. मनोमय

समभाव

परीक्षा: दो दुश्मनों को गले लगवाओ। जाति-भेद मिटाओ।

वर्जित: पक्षपात, "मेरा वाला" मना है।

4. विज्ञानमय

ज्ञानभाव

परीक्षा: गीता का 1 श्लोक और उसका विज्ञान जनता को समझाओ। भ्रम तोड़ो।

वर्जित: अंधविश्वास फैलाना मना है।

5. आनंदमय

निष्काम भाव

परीक्षा: सेवा करके फोटो न खिंचवाओ। परिणाम भगवान पर छोड़ो।

वर्जित: पद का लालच, फोटो-प्रचार मना है।

"पद ऊपर से नहीं उतरेगा, कोश नीचे से सिद्ध होगा। जो अन्नमय से शुरू करेगा, वही आनंदमय तक पहुंचेगा।"

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